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Playlist of आजादी के 70 सालो में पहली बार आदिवासी समाज ने किया संसद का घेराव

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    आदिवासी समाज

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    आदिवासी

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    सच्चे आदिवासी जरूर सुने विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर सतीश पेंदाम का अलीराजपुर में धमाकेदार भाषण।

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    आजादी के 70 सालो में पहली बार आदिवासी समाज ने किया संसद का घेराव-Jay Adivasi Yuva Shakti

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    ABHAY NEWS

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    इतिहास की किताबो में जगह नही मिली भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी को !!

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    जिस भारतीय ने सबसे पहले ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत करके, अंग्रेजो से लोहा लिया था उनका नाम था तिलकमांझी उन्होंने 1857 के विद्रोह के लगभग 100 साल पहले ही उन्होंने यह बगावत की थी, किन्तु उन्हें भारतीय इतिहास में वह शोहरत नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। चूँकि भारतीय इतिहास लेखन में हमेशा से उच्च वर्ग का वर्चस्व रहा है इसिये एक गरीब आदिवासी को इतिहास की किताबो में स्थान न मिलना कोई हैरानी की बात नही है ,, किन्तु भारत में स्वाधीनता संग्राम की प्रथम मशाल सुलगाने वाली और अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला देने वाली इन जंगली आदिवासी जातियां को कभी भुलाया नही जा सकता । इन्हीं आदिवासी जातियों में तिलकामांझी का नाम प्रथम विद्रोही के रूप में लिया जाता है

    तिलकामांझी का जन्म 1750 में बिहार राज्य के भागलपुर के निकट एक आदिवासी परिवार में हुआ था। बचपन से ही वह जंगली सभ्यता की छाया में तीर धनुष चलाने, बड़े-बड़े वृक्षों पर चढ़ने उतरने और जंगली जानवरों का शिकार करने में निपुण थे। जंगली जीवन ने उसे वीर बना दिया था। किशोर जीवन से ही उन्होंने अपने परिवार और जाति पर अंग्रेजी सत्ता का अत्याचार देखा था। ये सब देखकर उनका खून खौल उठता और अंग्रेजी सत्ता से टक्कर लेने के लिए उनके मन में विद्रोह की लहर पैदा होती।
    गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेजी शासक अपना अधिकार किये हुए थे। जंगली आदिवासियों के बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों को अंग्रेज तरह-तरह से यातनाएं देते थे। पहाड़ों के इर्द-गिर्द बसे हुए जमींदार अंग्रेजी सरकार को धन के लालच में खुश किये हुए थे।
    अंततः ,इन सब से तंग आकर तिलका मांझी ने अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। वीर तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासी वीरों के विद्रोही कदम भागलपुर, सुल्तानगंज तथा दूर-दूर तक जंगली क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे थे।
    उन्होंने अपने साथ अंग्रेजो द्वारा सताये गए बहुत सारे आदिवासियों से मिलकर एक सेना तैयार कर ली थी हिन्दू मुस्लिम में फूट डालकर शासन करने वाली ब्रिटिश सत्ता को तिलका मांझी ने ललकारा शुरू कर दिया था ।
    स्थिति का जायजा लेकर अंग्रेजी सरकार ने क्लीव लैंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर तिलकामांझी को गिरफ्तार करने भेजा। क्लीव लैंड की सेना और पुलिस दल के साथ वीर तिलका की कई स्थानों पर जमकर लड़ाई हुई। तिलका अंग्रेजो से जमकर मुकाबला करते थे , जिससे अंग्रेजो में दहशत फैलने लगी । उसके सैनिक छिप-छिपकर अंग्रेजी सेना पर अस्त्र प्रहार करने लगे।

    एक रात तिलका मांझी और उसके क्रान्तिकारी साथी जब एक उत्सव में नाच गाने की उमंग में खोए थे कि अचानक क्लीव लैंड की सेना ने इन वीरों पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हुए आक्रमण से तिलका मांझी तो बच गये किन्तु अनेक देशभक्त वीर शहीद हो गए और कुछ को बन्दी बना लिया गया। तिलका मांझी के वहां से बचकर निकलने पर अंग्रेजो ने भागलपुर से लेकर सुल्तानगंज व उसके आसपास के पर्वतीय इलाकों में उन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछा दिया।
    और एक समय ऐसा भी आया जब अंग्रेजी सेना ने मैजिस्ट्रेट क्लीव लैंड के नेत्रत्व में तिलका को जंगल में चारो तरफ से घेर लिया वीर तिलका का अब बच के निकलना संभव नही था तो उन्होंने तय कर लिया के मैं तो मरूँगा लेकिन इस अंग्रेज अफसर को साथ लेकर मरूँगा और मौका पाकर वो एक ताड के पेड़ पर चढ़ गए पेड़ पर चड़कर उन्होंने अपने आप को पत्तो में छुपा लिया वे अपने निचे अंग्रेज सैनको को इधर से उधर घूमते हुए साफ़ साफ़ देख रहे थे उन सभी अंग्रेजो के हाथो में बंदूके थी और वे कुत्ते के तरह तिलका को ढूंड रहे थे तिलका के पास हथियार के रूप में सिर्फ धनुष बाण था वे बिना कोई आवाज़ किये साँस रोके पेड़ पर छुपे हुए इन्तजार कर रहे थे के कब अंग्रेज अफसर क्लीव लैंड उस पेड़ के करीब आये और वे अपना मिशन पूरा कर सके
    उन्हें एहसास था के उनके पास हमले का सिर्फ एक ही मौका होगा और वे उस मौके को गवाना नही चाहते थे इन्तजार करते करते घंटो बीत गए और आखिरकार क्लीव लैंड अपने घोड़े पर सवार होकर उस पेड़ के निचे आ खड़े हुए, मांझी को तो बस इसी मौके का इन्तजार था उन्होंने बिना किसी देरी के तीर धनुष का निशाना उस अफसर पर लगाया।
    और अगले ही पल उनके धनुष से तीर छुटा जो की सरसराते हुए अंग्रेज अफसर के सेने को चीरता हुआ आर पार हो गया अफसर तुरंत घोड़े से गिर पड़ा और कुछ ही समय में उसने छट पटाकर अपने प्राण त्याग दिए ,, कुछ समय के लिए वहा मोजूद सभी अंग्रेज सैनिक घबराकर इधर उधर भागने लगे किसी की समझ में नही आया के बिजली से रफ़्तार सा ये तीर कहाँ से आया है
    लेकिन थोड़े ही समय उपरांत तिलका मांझी को घेर कर गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उस वीर सपूत को एक पेड़ पर ही लटका कर फांसी दे दी और इस तरह से हमारे देश के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी सदा के लिए अमर हो गए
    References -

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    पहली बार आदिवासी बनेगा देश का राष्ट्रपति ! | Indian President Election Update |

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    पहली बार आदिवासी बनेगा देश का राष्ट्रपति !, ये रहे संभावित नाम | Indian President Election Update |

    देश में राष्ट्रपति चुनाव का बिगुल बज चुका है आगामी 20 तारीख को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नया उत्तराधिकारी देश के सामने होगा। चुनाव आयोग की घोषणा के बाद पक्ष विपक्ष ने चुनाव के लिए कमर कस ली है। हालांकि अभी तक भी दोनों पक्ष पत्ते खोलने को तैयार नहीं हैं, हालांकि इतना साफ है कि सत्तारूढ़ एनडीए के रणनीतिकारों ने अपनी ओर से इस पद के लिए उम्‍मीदवार का नाम तय कर लिया है उसे इंतजार है तो बस विपक्ष के पत्ते खोलने का। ताकि विपक्ष की रणनीति सामने आने के बाद ही अपना दांव चला जाए और वो भी ऐसा जिसका तोड़ विपक्ष न निकाल सके। कुछ चेहरे ऐसे हैं जिन पर सबसे ज्यादा उम्‍मीद की जा रही है। तो चलिए आइए डालते हैं ऐसे ही कुछ संभावित चेहरों पर एक निगाह।इस लिस्ट में सबसे आगे जिस नाम की चर्चा है वह है मोदी सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलौत की। 69 साल के गहलौत राज्यसभा के सदस्य हैं और संसद के सौम्य और सरल चेहरे माने जाते हैं। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों का नजदीकी माना जाता है। दलित समुदाय से आने वाले थावरचंद गहलौत कुछ दिन के लिए मीसाबंदी विवाद में भी फंसते नजर आए थे लेकिन जल्द ही प्रदेश और केंद्र सरकार की सफाई के बाद यह मामला ठंडा पड़ गया। माना जा रहा है कि थावरचंद को राष्ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनाकर भाजपा दलितों को अपने पाले में करने के लिए बड़ा दांव खेल सकती है। झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मु का नाम पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चाओं में बना हुआ है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी की पहली पसंद बताया जा रहा है। उसकी बड़ी वजह ये भी है कि अभी तक देश में दलित भी राष्ट्रपति बन चुके हैं और अल्पसंख्यक भी, लेकिन कोई आदिवासी आज तक इस पद पर नहीं पहुंचा है। ऐसे में सामाजिक समरसता का बड़ा उदाहरण पेश करते हुए भाजपा मुर्मु को आगे कर सकती है। उत्कल यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट मुर्मु भाजपा के उस अभियान में भी फिट बैठती हैं ‌जिसके सहारे पार्टी उड़ीसा जैसे बड़े राज्य में खुद को सत्ता तक पहुंचाने की कवायद कर रही है। दो बार उड़ीसा की विधायक रही मुर्मु का नाम राज्यपाल के लिए भी इसी तरह चौंकाते हुए सामने आया था। इस सूची में और भी कई चेहरे हैं देखें पूरा वीडियो...

    Election Commission announced date of president election but NDA and UPA alliance not yet announce there candidate of president post but our sources update that one of them may be the candidate of presidential post of NDA. According to sources if Draupadi Murmu got this post from NDA there is a historic movement for tribes because first time of indian history a tribal candidate be a president of india.


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    Bheel samaj ka itihaas / Bheel samaj ki utapti / भील समाज का इतिहास /Bheel samaj history /

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